बच्चों की समस्याएँ जिनको हमें बिलकुल अनदेखा नही करना चाहिए

‘चाइल्ड इज़ द फादर ऑफ मैन’ यानी एक बच्चे के मन के भीतर एक पूरा का पूरा इंसान छिपा होता है. यदि हम एक शांत व विकासशील समाज की चाह रखते हैं, तो बच्चों के मन को अशांत होने से बचाना हमारी ज़िम्मेदारी बन जाती है. मनोवैज्ञानिकों द्वारा कराए गए एक सर्वे में पाया गया कि अपने बच्चों को बुरी तरह से प्रताड़ित करनेवाले अधिकतर अभिभावक ऐसे थे, जो बचपन में अपने पैरेंट्स द्वारा उपेक्षित व पीड़ित किए गए थे ।
बच्चों से जुड़ी कई मनोवैज्ञानिक समस्याएं हैं, जैसे- एकेडैमिक समस्याएं, मेंटल प्रॉब्लम, फिज़िकल प्रॉब्लम, बिहेवियर प्रॉब्लम, चिड़चिड़ापन आदि. सखियों इस लेख में मैं मोना प्रयास कर रही हूँ कि इन सब समस्याओं के कारण और उनके साधारण तार्किक हल आपको प्रदान किये जा सकें.

एकैडेमिक से जुड़ी समस्याएं

10 से 20% बच्चे कम्पटीशन के चलते इतना ज़्यादा पढ़ते हैं कि उनकी सोशल लाइफ ज़ीरो हो जाती है. इस तरह के बच्चे हमेशा टेेंशन में रहते हैं. अपने परफॉर्मेंस को लेकर, ख़ासकर जो बच्चा कई सालों से फर्स्ट आ रहा हो, तो उस पर इसे मेंटेन करने का दबाव बना रहता है. यह ज़रूरी नहीं कि जो बच्चा पहली-दूसरी कक्षा में फर्स्ट आता रहा है, वो नौंवीं में भी फर्स्ट ही आए. ब्रिलियंट स्टूडेंट्स भी उतार-चढ़ाव से गुज़रते हैं.

इस समस्या के कुछ सामान्य समाधान 

  • ऐसे बच्चों के पैरेंट्स को उन्हें सोशल होने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए. रिश्तेदार-दोस्तों से मिलने-जुलने के लिए प्रेरित करना चाहिए.
  • बच्चों को भी पढ़ाई के अलावा दूसरी बातों के लिए थोड़ा स्पेस दें.
  • टाइम टेबल बनाना अच्छी बात है, पर उसमें आधा से ज़्यादा समय पढ़ाई और कुछ देर ही मनोरंजन के लिए हो, यह ठीक नहीं है.
  • बच्चे के लिए पढ़ाई बहुत ज़रूरी है, बस ज़रूरत है बच्चों के दिलो-दिमाग़ में उसके प्रति दिलचस्पी और लगाव पैदा किया जाए.

शारीरिक समस्याओं को नज़रअंदाज़ न करें

  • जो बच्चे पढ़ने में कमज़ोर होते हैं, उन्हें पैरेंट्स के ताने-उलाहने सुनने पड़ते हैं, जिससे वे तनाव और हीनभावना से भी ग्रस्त हो जाते हैं. हो सकता है बच्चे को लर्निंग डिसएबिलिटी की समस्या हो या फिर एडीएचडी (अटेंशन डिफिट हायपरएक्टविटी डिसऑर्डर) या एडीडी (अटेंशन डिफिट डिसऑर्डर) की समस्या हो. पैरेंट्स-टीचर्स को बच्चे की इस समस्या को समझने की कोशिश करनी चाहिए.
  • ऑटिज़्म बीमारी भी दिमाग़ी तंत्र से जुड़ी है. इससे ग्रस्त बच्चे का संवेदी तंत्र अव्यवस्थित होता है, जिससे वो सामान्य बच्चों की तरह नहीं रहता. इन बच्चों को भी विशेष देखभाल, प्यार और प्रोत्साहन की ज़रूरत होती है.
  • एसपर्जर, यह ऑटिज़्म का ही माइनर प्रॉब्लम है. इसमें बच्चा आई कॉन्टेक्ट कम रखता है, कम बोलता व सुनता है. केवल हां-ना में ही अधिक बात करता है. कभी-कभी तो ज़िंदगीभर इसका पता ही नहीं चलता है, जिसकी वजह से पैरेंट्स कोई ट्रीटमेंट भी नहीं करवा पाते हैं. लेकिन समय रहते मालूम होने पर इसका इलाज संभव है. फिर भी इस समस्या को बहुत कम लोग ही समझ पाते हैं.
  • व़क्त के साथ लड़कियों के प्यूबर्टी पीरियड में बदलाव आया है. अब 6-7 कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते लड़कियों को पीरियड होने लगते हैं. ऐसे में पैरेंट्स के लिए इसे डील करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है. लड़कियां भी अपने शरीर के इस बदलाव को लेकर कई बार तनावग्रस्त और हताश-परेशान हो जाती हैं.
  • बेटियों के पैरेंट्स ख़ासकर माएँ बेसिक हार्मोंनल चेंजेस, पीरियड्स होने के कारण और केयर, सुरक्षित रख-रखाव आदि के बारे में उन्हें बताएं और समझाएं. बेटियों किो समझाएं कि इन बातों को वे जितनी सहजता से लेंगी, उतना ही रिलैक्स और तनावमुक्त रहेंगी.

बिहेवियर प्रॉब्लम्स

आज बच्चों के बीच बिहेवियर इश्यू सबसे बड़ी मनोवैज्ञानिक समस्या बन गई है. एक ज़माना था, जब कई बच्चे होते थे और छोटों के लिए उनके बड़े भाई-बहन भी रोल मॉडल हुआ करते थे, पर अब एकल परिवार और एक ही बच्चा पालने की प्रवृत्ति ने बहुत कुछ बदल दिया है.

बच्चों का आक्रामक होनाः

  • बच्चों के लिए आक्रामक व्यवहार उनकी इच्छापूर्ति का साधन होता है. उनमें धैर्य की कमी होती है.
  • बच्चे को अपने आवेश पर नियंत्रण करना सिखाएं और उसे अपनी भावनाओं को शारीरिक माध्यम के स्थान पर शब्दों में अभिव्यक्त करने के लिए समझाएं. उसे समझाएं कि इस प्रकार उसके मित्र भी अधिक बनेंगे.
  • बच्चे से धैर्य से बात करें और उसके असामान्य व्यवहार के कारणों को जानने की कोशिश करें. हो सकता है वो ख़ुद को असुरक्षित अनुभव कर रहा हो. आपका प्यार-दुलार उसकी मानसिक पीड़ा को शांत करेगा.
  • हाइपर चाइल्ड है, तो हर रोज़ घर से बाहर, बगीचे या खेल के मैदान में ले जाएं. जहां वह पूरी आज़ादी से खेल सके, भागदौड़ सके.

ज़िद करनाः बच्चों को अपनी परिस्थिति से अवगत कराएं. उन्हें मॉरल वैल्यू के बारे में शुरू से समझाएं, क्योंकि इसी से अच्छे व्यक्तित्व की नींव बनती है. जब बच्चे बहुत छोटे होते हैं, तब शौक़ और ख़ुशी के चलते अभिभावक बच्चों की हर सही-ग़लत मांग पूरी करते जाते हैं, ऐसा न करें. इसी से थोड़ा बड़ा होने पर उसे शह मिलती है और वो अपनी बात को मनवाने के लिए ज़िद का सहारा लेने लगता है.

झूठ बोलनाः बच्चे के टीचर्स से मिलकर उसकी झूठ बोलने की आदत के बारे में बात करें. कहीं पैरेंट्स या टीचर्स की सख़्ती और मार के डर से तो बच्चा झूठ नहीं बोल रहा. बच्चे के झूठ बोलने पर सज़ा देने की बजाय प्यार से झूठ बोलने के कारणों के बारे में जानने की कोशिश करें. यदि पैरेंट्स बच्चों को खुला और स्वस्थ माहौल दें, तो बच्चे शायद ही झूठ बोलें.

डरपोक और दब्बू होनाः

अक्सर पैरेंट्स द्वारा बचपन में बच्चों को भूत-अंधेरे आदि का डर दिखाया जाता है. ये सभी बातें उनके अंतर्मन में कहीं न कहीं गहराई तक पैठ जाती हैं. वे नहीं जानते कि ऐसा करके जाने-अनजाने में वे अपने बच्चे का आत्मविश्‍वास कमज़ोर कर रहे हैं. ऐसा न करें. बेहतर होगा कि पैरेंट्स बच्चों के साथ एडवेंचर्स से भरपूर गेम्स खेलें. बहादुर और प्रेरणास्त्रोत महान लोगों की क़िस्से-कहानियां सुनाएं. यदि ज़रूरत हो, तो पर्सनैलिटी इम्प्रूवमेंट क्लास या फिर काउंसलर की मदद लेने से भी न हिचकें.

चोरी करना या चीज़ों को बिना बताए उठानाः चीज़ों को बिना पूछे उठा लेना यानी अप्रत्यक्ष रूप से चोरी करना आदि. कई बच्चे अनजाने में ऐसा करते हैं. इसे क्लेटो मेनिया कहते हैं. इसमें ज़रूरी नहीं कि बच्चा क़ीमती चीज़ें ही उठाए, वो ढेर सारे पेन-पेंसिल आदि भी उठा सकता है.

जब बच्चा पहली बार चोरी करे, तो शांत रहें. आकलन करें और चोरी का कारण ढूंढ़ें. बच्चे की मानसिक अवस्था को समझते हुए अच्छे उदाहरणों और प्यार से हैंडल करने पर बच्चा अपनी ग़लतियों में ज़रूर सुधार करेगा.

एक्सपोज़र से उभरती सेक्सुअल समस्याएं

  • इन दिनों पांचवीं-छठी क्लास के बच्चों में इंटरनेट पर अश्‍लील चीज़ों को देखने जैसी समस्याएं भी उभरकर आने लगी हैं.
  • माना पढ़ाई और व़क्त की मांग के चलते नेट सर्फिंग करना, कंप्यूटर आदि बच्चों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है, पर इसमें कुछ बच्चे जहां 25 चीज़ें काम की देखते हैं, तो 26 वीं ग़लत व अश्‍लील भी होती है. कई बार पोर्नोग्राफी देख उनमें एक्सपेरिमेंट की चाह बढ़ती है. लर्निंग डिसएबिलिटी पनपती है. ऐसे में सेक्स एजुकेशन ज़रूरी हो जाता है.
  • साथ ही बच्चों को यह भी समझाया जाए कि क्या स्वीकार्य है और क्या नहीं. काउंसलर्स का कहना है कि उनके यहां तीसरी-चौथी के बच्चों के केस आते हैं,
  • जो स्कूल में टॉयलेट में अधिक जाते हैं, जहां वे अपने प्राइवेट पार्ट्स से खेलते हैं. मास्टरबेशन करते हैं आदि.
  • यदि छह महीने का बच्चा अपने पेनीस से खेलता है, तो यह एक नॉर्मल बात है. लेकिन 7-8 साल का बच्चा करें, तो एब्नॉर्मल समझा जाता है. इसलिए पैरेंट्स अपने बच्चों के बिहेवियर पर भी बारीक़ी से नज़र रखें, क्योंकि ऐसे समय में उन्हें अपनों के सही मार्गदर्शन की सख़्त ज़रूरत होती है, ताकि सेक्स को लेकर भी उनका विकास सामान्य हो, मन में ग़लत बातें व ग्रंथियां न पनपें.

निष्कर्ष 

आज के दौर में बच्चे असुरक्षित माहौल, ज़िंदगी से अधिक महत्वाकाक्षांओं की उड़ान, थकान, तनाव आदि के साथ पल-बढ़ रहे हैं. नए-नए वीडियो गेम्स, प्ले स्टेशन ने उनकी आउटडोर एक्टिविटी़ज़, आउटडोर गेम्स आदि को भी कम कर दिया है. उस पर पढ़ाई व उनके पर्सनैलिटी से जुड़े अलग-अलग क्लासेस में भी वे उलझे रहते हैं. ऐसे में बच्चे सहजता से जीना नहीं सीख पाते, बल्कि हर समय प्रतिद्वंद्विता, पाने और आगे बढ़ने की होड़ के लिए ट्रेन्ड होते रहते हैं. इन सभी से बच्चे के अधिक दोस्त नहीं बन पाते और वे अकेलेपन से जूझते रहते हैं. इस तरह मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें, तो ऐसे बच्चे दूसरों के साथ सहनशील होना और सामंजस्य बैठाना नहीं सीख पाते हैं. यदि पैरेंट्स अपने एटिट्यूड में थोड़ा-सा बदलाव लाएं, तो इसमें काफ़ी मदद मिल सकती है. पैरेंट्स अपने बच्चे की अन्य बच्चे से तुलना करने की बजाय उसमें मौजूद गुणों को प्रोत्साहित करें, बिना शर्त अपना प्यार-स्नेह लुटाएं, तो यक़ीनन बच्चे आत्मविश्‍वासी बनेंगे और ज़िंदगी की हर चुनौती का डटकर सामना करेंगे. साथ ही फिज़िकली, मेंटली और इमोशनली ख़ुशमिज़ाज इंसान भी बन सकेंगे.

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